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कात्यायनी देवी (कथरी देवी) का मन्दिर

कानपुर देहात का ख्याति प्राप्त कात्यायनी देवी का मन्दिर यमुना नदी के बीहड़ के उत्तरी क्षेत्र में मुगल रोड से शाहजहांपुर गांव से 6 किलोगीटर दूर दक्षिण में कथरी गांव में स्थित है। तहसील मुख्यालय भोगनीपुर से इस मन्दिर की दूरी 16 किलोमीटर है। पिछले दो दशकों में यह मन्दिर यमुना के बीहड़ दस्यु गिरोहों का आस्था का स्थल रहा है। मौनी बाबा नामक साधु ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया है। नवरात्रि के समय इस मन्दिर में बड़ा मेला लगता है। मेले में निकटवर्ती जनपदों के भी श्रद्धालु एवं भक्तगण आते है। कहा जाता है कि ग्राम शाहजहांपुर के पण्डित गजाधर ने सन्तान प्राप्ति की इच्छा पूरी हो जाने के कारण वर्तमान मन्दिर में कात्यायनी देवी की मूर्ति की स्थापना करायी थी। मन्दिर के पश्चिम की ओर पुराना पक्का तालाब, पूर्व की ओर बारादरी के खण्डहर व उत्तर की ओर कुआं स्थित है।

दुर्वासा ऋषि आश्रम

विकास खण्ड मलासा के बरौर कस्बे से 5 किलोमीटर दूर सेंगुर नदी के किनारे ग्राम निगोही में दुर्वासा ऋषि का आश्रम स्थित है। आश्रम की सुरम्य नैसर्गिक सुषमा देखने लायक है। जनश्रुति के अनुसार महाकाव्य काल के पूर्व सूर्यवंशी राजा दिलीप के पहले दुर्वासा ऋषि ने यहां आकर तपस्या की थी और प्रतिदिन गंगा स्नान करने के लिये बिठूर (ब्रम्हावर्त) जाया करते थे। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा माता ने कहा कि मै स्वयं तुम्हारे आश्रम के पास आकर बहूंगी। दुर्वासा जी ने कहा कि मुझे कैसे मालूम होगा कि गंगा माता आ गयी है। जिस पर गंगा माता ने भाऊ के पेड़ उग आने की बात कही थी। आज भी भाऊ के वृक्ष आश्रम के समीप स्थित है। कालान्तर 500 ई0 के लगभग गुप्तकाल में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने दुर्वासा ऋशि आश्रम में एक भव्य मन्दिर का निर्माण कराया था। किन्तु नदी की बाढ़ के कारण वह अधिक दिनों तक नहीं टिक सका।